maana hai hamne ek lamhe ko hi poori zindagi | माना है हमने एक लम्हे को ही पूरी ज़िंदगी

  - "Dharam" Barot

माना है हमने एक लम्हे को ही पूरी ज़िंदगी
धोखा नहीं कोई हक़ीक़त है अधूरी ज़िंदगी

कुछ भी नहीं ये ज़िंदगी तन्हा सफ़र ही तो है और
पहचान ने को ये सफ़र होती ज़रूरी ज़िंदगी

जब आठ बारह और सोला घंटे करना काम तो
करके लगा था ये पता बस जी-हुज़ूरी ज़िंदगी

मीठा कभी तीखा कभी हर स्वाद ही था साथ यार
क्या ही कहूँ फिर कह दिया ये भेलपूरी ज़िंदगी

हर एक दिन वो कोसती है मुझको क्यूँ ही मिल गए
हर एक से कहती धरम ही मेरी पूरी ज़िंदगी

  - "Dharam" Barot

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