कम या ज़्यादा बात इतनी ही नहीं थी
लग रहा था बातों से मेरी नहीं थी
ज़िंदगी में और भी आ सकते थे पर
ज़िंदगी जीने की भी मर्ज़ी नहीं थी
सब का हो जाए भला इतनी दुआ हो
पर ख़ुदा के पास ये अर्ज़ी नहीं थी
जो कभी तो हाँ में हाँ करती थी मेरे
अब वो मेरी बात तक सुनती नहीं थी
मैं बुरा इतना न था उसको मेरी ये
बात भी क्यूँ यार अब जमती नहीं थी
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