रात भर ये तू जो महफ़िल है सजातासुब्ह फिर ग़मगीन होकर ये बतातादेख ख़ुशियाँ तू तो ज़ीरो की मनाताज़ीरो का है ग़म ये सारा फिर जताता— "Dharam" Barot