हम करें शे'र और शायरी कब तलक
हम भरें तुम से ये डायरी कब तलक
और कब तक सनम होंगे हम दर ब दर
सर रहेगी ये आवारगी कब तलक
हर्फ़ दर हर्फ़ कब तक रखें हम तुम्हें
अब करें हम ये कारीगरी कब तलक
बंद होगी ये हैवानियत कब ख़ुदा
बेटियाँ यूँँ मिलेंगी मरी कब तलक
ऐ क़जा अब तो कुछ हक़ अदा कर दे तू
यूँँ हमें मारेगी ज़िंदगी कब तलक
समझेगा तू मुझे जाने कब क्या पता
ख़त्म होगी ये नाराज़गी कब तलक
मुंतजिर है सुख़न लब तेरे छूने को
जाने ये इंतिज़ारी अभी कब तलक
हँस के ग़म तो छिपा लोगे अपना मगर
इन लबों पर रहेगी हँसी कब तलक
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