तेरे बाद भी आईं और गईं कितनी ही हसीनाएँ जान
मैंने लेकिन हिज्र के ग़म का वो भौकाल बनाए रक्खा
तेरे लौट आने का इस दिल को अरसों तक वहम रहा दोस्त
सो बरसों मैंने भी अपनी दाढ़ी बाल बनाए रक्खा
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