कौन है जो मिरा ग़म बढ़ा देता है
माज़ी के दर से मुझ को सदा देता है
हौसला ज़िंदा है तो मैं भी ज़िंदा हूँ
हादसा वरना सब कुछ मिटा देता है
जैसे ही पीता हूँ मैं ख़ुशी थोड़ी सी
मेरा इक दोस्त दूरी बढ़ा देता है
नींद में ख़्वाब भी अजनबी की तरह
बस चला जाता है ग़म बढ़ा देता है
माँ की तो अहमियत जानता ही नहीं
अपनी बातों से उसको रुला देता है
ये परेशानियों का जो तूफ़ाँ सा है
जीने की हर तमन्ना बहा देता है
आदमी की तरह आदमी तो नहीं
जो हज़ारों घरों को जला देता है
बाप के कंधों का बोझ क्या जाने वह
पैसों को शौक़ में जो उड़ा देता है
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