kaun hai jo miraa gham badha deta hai | कौन है जो मिरा ग़म बढ़ा देता है

  - Meem Alif Shaz

कौन है जो मिरा ग़म बढ़ा देता है
माज़ी के दर से मुझ को सदा देता है

हौसला ज़िंदा है तो मैं भी ज़िंदा हूँ
हादसा वरना सब कुछ मिटा देता है

जैसे ही पीता हूँ मैं ख़ुशी थोड़ी सी
मेरा इक दोस्त दूरी बढ़ा देता है

नींद में ख़्वाब भी अजनबी की तरह
बस चला जाता है ग़म बढ़ा देता है

माँ की तो अहमियत जानता ही नहीं
अपनी बातों से उसको रुला देता है

ये परेशानियों का जो तूफ़ाँ सा है
जीने की हर तमन्ना बहा देता है

आदमी की तरह आदमी तो नहीं
जो हज़ारों घरों को जला देता है

बाप के कंधों का बोझ क्या जाने वह
पैसों को शौक़ में जो उड़ा देता है

  - Meem Alif Shaz

Ummeed Shayari

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