पुराने ज़ख़्म छिल जाने में कितनी देर लगती है
बिछड़ कर ज़हर फिर खाने में कितनी देर लगती है
ज़रा सा वक़्त लगता है किसी की याद आने में
मगर फिर ख़ुद को समझाने में कितनी देर लगती है
अरे आते हुए जाते हुए देखा करो हमको
पलट कर देख मुड़ जाने में कितनी देर लगती है
मेरा दिल है ज़रा शीशा ज़ुबाँ लोगों की पत्थर है
ज़ुबाँ लोगों की चल जाने में कितनी देर लगती है
समंदर तुम नहीं थे वर्ना लहरों से चले आते
किनारे पर चले आने में कितनी देर लगती है
मुक़दमा कब चलेगा इस मोहब्बत का अदालत में
बता तो दे तेरे थाने में कितनी देर लगती है
किसी का दिल दुखाया तो उसे जाकर मनालो तुम
किसी की भी ख़बर आने में कितनी देर लगती है
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