chot ko sahne ke hain ye falsafe ab | चोट को सहने के हैं ये फ़लसफ़े अब

  - Lalit Mohan Joshi

चोट को सहने के हैं ये फ़लसफ़े अब
आबले जो मेरे पैरों के दिखे अब

पेश आओ दोस्त नर्मी से यहाँ तुम
होंठ भी ख़ामोश मेरे हो गए अब

ये मुक़द्दर मेरा मुझ सेे पूछता है
आँखों से आँसू ये तेरे क्यूँ बहे अब

जी लिया जिसके सहारे हमने ये पल
उन दिनों को याद कर रोने लगे अब

बात इतनी है यहाँ पर दोस्तो फिर
बोलकर सच हम चलो ज़िंदा जले अब

कुछ ख़याली नोचते हैं शायरी को
शायरी है मौत के जो रास्ते अब

बज़्म में साहब 'ललित' के सब दिवाने
शे'र यानी ज़ेहन में घुलने लगे अब

  - Lalit Mohan Joshi

More by Lalit Mohan Joshi

As you were reading Shayari by Lalit Mohan Joshi

Similar Writers

our suggestion based on Lalit Mohan Joshi

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari