hamne to ik raat phir khush-khwab dekha hai | हमने तो इक रात फिर ख़ुश-ख़्वाब देखा है

  - Lalit Mohan Joshi

हमने तो इक रात फिर ख़ुश-ख़्वाब देखा है
उसके घर में चादर-ए-महताब देखा है

हो गया क्या ये ग़ज़ब अब यार देखो सब
हमने अपने घर में इक महताब देखा है

इक तरफ़ घर और ये पैसे कमाना रोज़
हमने ख़ुद को ऐसे फिर दो-आब देखा है

नौकरी करने से जाना हमने ये यारो
आँख को यूँँ रोज़ फिर बे-ख़्वाब देखा है

ज़िंदगी की उलझनों से यूँँ उलझते फिर
हमने ग़म को रोज़ फिर हम-ख़्वाब देखा है

था हुनर जिसको यहाँ पानी पिलाने का
उसका अक्सर हमने ग़म अहबाब देखा है

वो यहाँ है गौहर-ए-नायाब सबका पर
हमने ख़ुद को गौहर-ए-बे-आब देखा है

  - Lalit Mohan Joshi

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