एक दिन मैं यार हो बंजर गया
इस जहाँ से यार जब मैं मर गया
साँस दिल से राब्ता सब तोड़कर
यार तन्हा तो ज़ियादा कर गया
आँख पर तो अश्क आऍंगे यहाँ
यार उन सेे जाने वो क्यूँ डर गया
और दो दिन शोक भी होगा मेरा
जब ख़ुदा के यार जो मैं घर गया
छोड़कर सब कुछ यहाँ मैं बस सुनो
याद को ज़िंदा यहाँ बस कर गया
संग अपने कुछ भले मैं काम लूॅं
राख ख़ुद बनके यहाँ तो मर गया
एक दिन मैं काम पर जाकर कहीं
फिर नहीं अब लौटकर जो घर गया
यार लिखकर ग़म यहाँ सबके सुनो
अब यहाँ ख़ुद को अमर भी कर गया
देखकर मैं भीड़ तेरे शहर की
हाथ की नस काट अब मैं मर गया
इस ज़माने से परेशाँ जब हुआ
तो 'ललित' ख़ुद क़त्ल अपना कर गया
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