क्या ख़ुदा ने इसे बनाया है
रूह ने इक लिबास पहना है
रूह अपनी बना के अच्छी तुम
काम बस ये करो तो अच्छा है
है ज़माना ख़िलाफ़ मेरे अब
जीत में क्यूँ ये मेरी रोता है
तल्ख़ बातों को आपकी सहना
ये हुनर यार मुझको आता है
उनकी आदत तमाश-बीं जैसी
हो बुरी सब मगर ये सहना है
बेवफ़ा की किताब को पढ़कर
इल्म मुझको वफ़ा का पढ़ना है
आपकी हर ग़ज़ल रवानी हो
यानी मौज़ूँ ग़ज़ल में जिंदा है
दूसरों का लिबास कब तक हो
ख़ुद को पहना करो तो अच्छा है
अजनबी इस जहाँ ने अक्सर ही
बस ललित को यहाँ रुलाया है
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