kya KHuda ne ise banaya hai | क्या ख़ुदा ने इसे बनाया है

  - Lalit Mohan Joshi

क्या ख़ुदा ने इसे बनाया है
रूह ने इक लिबास पहना है

रूह अपनी बना के अच्छी तुम
काम बस ये करो तो अच्छा है

है ज़माना ख़िलाफ़ मेरे अब
जीत में क्यूँ ये मेरी रोता है

तल्ख़ बातों को आपकी सहना
ये हुनर यार मुझको आता है

उनकी आदत तमाश-बीं जैसी
हो बुरी सब मगर ये सहना है

बेवफ़ा की किताब को पढ़कर
इल्म मुझको वफ़ा का पढ़ना है

आपकी हर ग़ज़ल रवानी हो
यानी मौज़ूँ ग़ज़ल में जिंदा है

दूसरों का लिबास कब तक हो
ख़ुद को पहना करो तो अच्छा है

अजनबी इस जहाँ ने अक्सर ही
बस ललित को यहाँ रुलाया है

  - Lalit Mohan Joshi

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