शिकायत से मुझे देखो घिरे रहना यूँँ पड़ता है
ज़माने के मुझे अब तंज को सहना यूँँ पड़ता है
नहीं कोई उठाता है जनाज़ा अब यहाँ यारो
मुझे भी लाश के अब साथ फिर रहना यूँँ पड़ता है
नहीं कुछ पा सके इस 'उम्र भर की चाकरी से भी
हमें बेबस ही दरिया संग अब बहना यूँँ पड़ता है
लगा है लगने साया ग़ैर भी अपना मगर फिर भी
हमेशा ख़ुद को ख़ुद ही तो बुरा कहना यूँँ पड़ता है
हमारा कौन हो जाए पराया अपना शायद फिर
हमें ऐसे भी कुछ चुप यार अब रहना यूँँ पड़ता है
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