shikaayat se mujhe dekho ghire rahna yuñ padta hai | शिकायत से मुझे देखो घिरे रहना यूँँ पड़ता है

  - Lalit Mohan Joshi

शिकायत से मुझे देखो घिरे रहना यूँँ पड़ता है
ज़माने के मुझे अब तंज को सहना यूँँ पड़ता है

नहीं कोई उठाता है जनाज़ा अब यहाँ यारो
मुझे भी लाश के अब साथ फिर रहना यूँँ पड़ता है

नहीं कुछ पा सके इस 'उम्र भर की चाकरी से भी
हमें बेबस ही दरिया संग अब बहना यूँँ पड़ता है

लगा है लगने साया ग़ैर भी अपना मगर फिर भी
हमेशा ख़ुद को ख़ुद ही तो बुरा कहना यूँँ पड़ता है

हमारा कौन हो जाए पराया अपना शायद फिर
हमें ऐसे भी कुछ चुप यार अब रहना यूँँ पड़ता है

  - Lalit Mohan Joshi

Rahbar Shayari

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