छत पे मेरा चाँद आया है
उसका मुझको दाग़ भाया है
आज कैसे हो अँधेरा फिर
चाँदनी ने दिल चुराया है
इक अदा ने उसकी मुझको तो
हर मरज़ से फिर बचाया है
दोस्त अब जीने न देंगे सब
सबने पत्थर बन रुलाया है
चोट पर फिर चोट खाने से
इक फ़साना अब कमाया है
आसमाँ को देखता है वो
दर्द यूँँ उसने छुपाया है
उसको शायद काम करने है
इस लिए दिल को लगाया है
मौत ग़म हो और क्या क्या है
सबने दिल को फिर दुखाया है
अब 'ललित' ख़ामोश इतना है
सबको हँसते ही दिखाया है
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