mujhe jeena nahin aaya | मुझे जीना नहीं आया

  - Lalit Mohan Joshi

मुझे जीना नहीं आया
मुझे बचपन नहीं भाया

चले ये ज़िंदगी कैसे
ग़लत जब दिल को बहलाया

यहीं दो गज़ ज़मीं में फिर
सभी को यार दफ़नाया

ख़ुशी की बात करते हैं
ग़मों को क्यूँ ये फैलाया

वो ख़ुद को सच समझता है
हमें उसने है झुठलाया

लिखी मेरी हैं ग़ज़लें जो
मुझे ख़ुद से है मिलवाया

पुरानी सब किताबों ने
मुझे फिर से है सुलझाया

लिखूँगा दर्द को हरदम
इसी ने ताज पहनाया

चला सुनसान राहों में
नहीं है डर कोई साया

  - Lalit Mohan Joshi

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