rulaakar hans diye vo kya kahein | रुलाकर हँस दिए वो क्या कहें

  - Lalit Mohan Joshi

रुलाकर हँस दिए वो क्या कहें
उन्हें आदत है ये तो क्या कहें

उन्हें तो इल्म भी होगा नहीं
मगर उन सेे कहे तो क्या कहें

बढ़ी हैं दूरियाँ अब दरमियाँ
ग़लत जब हैं हमीं तो क्या कहें

दुआ माँगी गई थी रोज़ इक
न रिश्ता भी बचा सो क्या कहें

दवा से दर्द क्यूँ इतना हुआ
यही है फ़िक्र हमको क्या कहें

हमें तो मश्वरा उनका मिला
ज़रूरत थी जिन्हें तो क्या कहें

ज़माना ख़ुद ख़ुदा बनता रहा
'ललित' इंसाँ बना तो क्या कहें

  - Lalit Mohan Joshi

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