शाम मेरी बहुत ही परेशान है
आँख ये देखकर यार हैरान है
रात कटती ये तो हिज्र में उसके फिर
क्या कोई बचने का इस सेे इम्कान है
आइना सच दिखाता रहा अपनों का
दिल मगर मुझ
में ही एक मेहमान है
इन दरख़्तों को क्यूँँ सब भला काटते
कट गए तो हमारा ही नुक़सान है
राब्ता हो गया बेवफ़ा से मेरा
ये मगर रास्ता यार सुनसान है
झोपड़ी छोड़ मैं शहर को आ गया
कैसे चेहरे पे झूठी ये मुस्कान है
वो किनारा नदी का मेरे गाँव में
शहर में दर्द का फिर से ऐलान है
शहर भर रौशनी ले के आया मगर
अब 'ललित' 'उम्र भर फिर पशेमान है
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