नई इक दोस्त मेरी जब से आदत हो गई है
मुझे लगता दुबारा से मोहब्बत हो गई है
मुझे काबिल ज़माने के बनाती जा रही जो
उसी लड़की से मेरी यार सोहबत हो गई है
नहीं मुझको ख़बर बेजान दुनिया की रही अब
उसी लड़की से दुनिया ख़ूबसूरत हो गई है
वही है चाँद तारे और उसको क्या कहूँ मैं
परी मुझको मिली तो अब्र-ए-रहमत हो गई है
'ललित' साहब ये दुनिया को बताते जा रहे फिर
वही लड़की जो उनकी सारी दौलत हो गई है
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