कभी लगता है सब ठीक हो गया है
कभी लगता है सब मेरा खो गया है
ये बेकार है गर बात यार फिर तो
मुझे रोग ये क्या कैसे हो गया है
ये वो दौर यक़ीनन नहीं हो सकता
पुराना वो तो इक दोस्त खो गया है
लिखा मैंने यूँँ ग़म अपना फोन में फिर
वो चिट्ठी का ज़माना तो खो गया है
समंदर हो चला साथ मेरे फिर से
किनारा यूँँ ग़मों से ही हो गया है
मैं कश्ती तो चला लूँ मगर मेरा तो
भरोसा कोई फिर तोड़ जो गया है
'ललित' रो दे न कमज़ोर इतना है पर
वो कोई वजह-ए-शक से रो गया है
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