क़र्ज़ उनका हम चुकाएँ कैसे
फ़र्ज़ अपना हम निभाएँ कैसे
पिंजरा अब हम खोल तो देंगे पर
उड़ना पंछी को सिखाएँ कैसे
साख़ काटी जिस शजर की तुमने
फूल उसके मुस्कुराएँ कैसे
वस्ल के ही ज़ख़्म अब दुखते हैं
ज़ख़्म ये फिर हम दिखाएँ कैसे
भीड़ ने नंगा किया औरत को
गर्व से सर हम उठाएँ कैसे
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