तू समझता ही नहीं उस के इशारे शहरोज़

और कहता है कि वो तुझ को पुकारे शहरोज़

आज मौका है उसे देख ले आँखें भरके
ऐसे मिलते है कहाँ रोज़ नज़ारे शहरोज़

ऐक धुन सी मेरे कानों में उतार आती है
जब वो कहती है "सुनो न मेरे प्यारे शहरोज़ "

तुझ को ये शौक-ए-मोहब्बत कहीं भारी न पड़े
तुझ को भी दिन में नज़र आए न तारे शहरोज़

अब तो हालात को सर अपना झुकाना होगा
ये तो मुमकिन नहीं हालात से हारे शहरोज़

ज़िन्दगी सारी लगा दूँ तो भी भरना पाऊँ
इस मोहब्बत ने दिए हैं वो ख़सारे शहरोज़

— Mujtaba Shahroz

More by Mujtaba Shahroz

Other ghazal from the same pen

See all from Mujtaba Shahroz →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling