मुझ को मालूम न थे प्यास के मानी पहले
चल के आता था मेरे पास में पानी पहले
अब तो बच्चों को भी देखो तो जवाँ लगते हैं
बा'द एक उम्र के आती थी जवानी पहले
कूचा-ए-यार से सेहरा में चले आए हैं
हम को आती न थी ये नक़्ल मकानी पहले
अब ये आलम के अदालत में चले जाते हैं
बाँटी जाती थी विरासत भी ज़बानी पहले
— Mujtaba Shahroz















