बदन सड़ता रहे किरदार उठ जाए
ज़मीन-ए-शोर से फ़नकार उठ जाए
छुपा लेता हूँ कुछ बातें ख़ुदाओं की
वगरना हर तरफ़ तलवार उठ जाए
बशर ऐसी सनक से चाल चल कोई
दिलों के बीच से दीवार उठ जाए
बुलंद आवाज़ की तासीर ऐसी है
अगर दिल से सुने बीमार उठ जाए
हमारा तख़्त लौटा दीजिएगा जब
हमीं से गर सही हक़दार उठ जाए
— Nikhil Tiwari 'Nazeel'















