ग़म-ए-दौराँ में हमने लाख चेहरे ज़र्द देखे हैं
जवाँ बेटों की लाशों पर बिलखते मर्द देखे हैं
कई मय-नोश को डर है ये मयख़ाना न ढह जाए
कि हर दीवार ने इतने तरह के दर्द देखे हैं
कमाया जो भी मेहनत से भला उस पर अना कैसी
खरे सोने में हमने दो परत के गर्द देखे हैं
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