हर किसी ने उसे कहा पत्थर
ऐसे वो शख़्स हो गया पत्थर
एक दिन बात तो बिगड़नी थी
एक था शीशा दूसरा पत्थर
चलते चलते मुझे आ टकराया
जाने क्या सोचता हुआ पत्थर
देखते देखते तेरी ही तरह
जाने कैसे मैं बन गया पत्थर
चल किसी रोज़ बैठ कर सोचें
कोई कैसे भला बना पत्थर
राम लिखना कभी नदी पे और
देखना तैरता हुआ पत्थर
— Ankit Raj















