यूँँ तो हर एक ज़माने का हुनर आता है
'इश्क़ के नाम से पर ज़ेहन में डर आता है
तेरे हर ग़म को मैं सीने में दबाऊँ कब तक
दर्द दिल का मेरे चेहरे पे उभर आता है
उसको तो मुझ सेे मोहब्बत ही नहीं होती माँ
तुम तो कहती थीं कि सोहबत का असर आता है
मैं सुख़न छोड़ के जो नौकरी की सोच भी लूँ
ख़्वाब में मीर तक़ी मीर नज़र आता है
अब तो लगता है यहाँ मैं ही ख़ुदा हूँ शायद
कोई सुनता नहीं जिसकी वो इधर आता है
As you were reading Shayari by Rohit tewatia 'Ishq'
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