तुझ को तो मालूम था मेरे यार, उदासी है

तुझ से ही तो हम कहते थे यार, उदासी है

तेरे हिस्से में अव्वल ख़ुशियाँ होंगी शायद
पर मेरे हिस्से में पहले यार उदासी है

मेरे पास नहीं कोई, तेरे पास तो हूँ मैं
फिर तेरी आँखों में कैसे यार उदासी है

ख़ुद को हँसता जब भी देखूँ, रो देता हूँ मैं
छाई इस दर्जे की मुझ पे यार उदासी है

जिस को गुमाँ हो मेरे यूँ बे-बात ही हँसने पे
वो मेरी आँखों में देखे यार, उदासी है

जो सावन होते सूखा, उस फूल पे लानत हो
मुझ पे लानत, तेरे होते, यार उदासी है

तुझ को हँसता देख के ही तो ज़िन्दा हैं सबलोग
तुझ से कोई कैसे कह दे यार, उदासी है

इसी उदासी ने ख़ुश-नज़री की दी है सौग़ात
देखो तो, कहने को वैसे यार, उदासी है

— Siddharth Saaz

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