आपके चेहरा-ए-गुलगूँ पे नज़र करते हैं
आपसे तो नहीं दुनिया से ज़रा डरते हैं
इस ज़लालत भरी दुनिया में हज़ारों बेकस
जिस्म को बेच के बच्चों का शिकम भरते हैं
हक़ की कोई नहीं करता है हिमायत देखो
हक़ परस्ती के मगर दावे सभी करते हैं
हम 'अजब लोग हैं देखो तो शजर दुनिया में
ज़िंदा रहने के लिए शाम-ओ-सहर मरते हैं
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