जब वो याद आते हैं
हिज्र भूल जाते हैं
अपना दिल जलाते हैं
तीरगी मिटाते हैं
लोग ज़ुल्म ढाते हैं
और मुस्कुराते हैं
उनका नाम लेने में
होंठ थरथराते हैं
चाँद जैसे चेहरे से
वो रिदा हटाते हैं
उतना याद आते हो
जितना हम भुलाते हैं
ख़ुद ही ज़ख़्म देते हैं
ख़ुद दवा लगाते हैं
चोर बनके आँखों से
ख़्वाब वो चुराते हैं
राह में मुहब्बत की
लोग चोट खाते हैं
आपकी ग़ज़ल नज़्में
रोज़ गुनगुनाते हैं
सुब्ह ग़म में डूबी है
ग़म में डूबी राते हैं
आसमाँ के सीने पर
तारे टिमटिमाते हैं
गुल को चूमते हैं हम
ख़ार तिलमिलाते हैं
तैर क़ैद-ख़ाने में
कैसे चैन पाते हैं
आप दिल चुराने का
फ़न कहाँ से लाते हैं
वो हमें शजर कहकर
क्यूँ नहीं बुलाते हैं
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