jab vo yaad aate hain | जब वो याद आते हैं

  - Shajar Abbas

जब वो याद आते हैं
हिज्र भूल जाते हैं

अपना दिल जलाते हैं
तीरगी मिटाते हैं

लोग ज़ुल्म ढाते हैं
और मुस्कुराते हैं

उनका नाम लेने में
होंठ थरथराते हैं

चाँद जैसे चेहरे से
वो रिदा हटाते हैं

उतना याद आते हो
जितना हम भुलाते हैं

ख़ुद ही ज़ख़्म देते हैं
ख़ुद दवा लगाते हैं

चोर बनके आँखों से
ख़्वाब वो चुराते हैं

राह में मुहब्बत की
लोग चोट खाते हैं

आपकी ग़ज़ल नज़्में
रोज़ गुनगुनाते हैं

सुब्ह ग़म में डूबी है
ग़म में डूबी राते हैं

आसमाँ के सीने पर
तारे टिमटिमाते हैं

गुल को चूमते हैं हम
ख़ार तिलमिलाते हैं

तैर क़ैद-ख़ाने में
कैसे चैन पाते हैं

आप दिल चुराने का
फ़न कहाँ से लाते हैं

वो हमें शजर कहकर
क्यूँ नहीं बुलाते हैं

  - Shajar Abbas

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