
ज़ुल्म की मिल के क़मर ऐसे करेंगे ख़म सब
दूर हो जाएँगे ये अपने वतन से ग़म सब
ख़्वाब अज्दाद ने जो देखा है इक दिन उस की
देखना ख़ून से ता'बीर लिखेंगे हम सब
— Shajar Abbas
Other sher from the same pen
Shers of zulm.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling