jigar pe zaKHm li.e hoke be-libaas shajar | जिगर पे ज़ख़्म लिए होके बे-लिबास शजर

  - Shajar Abbas

जिगर पे ज़ख़्म लिए होके बे-लिबास शजर
चले हैं दश्त-ए-जुनूँ हाए बद-हवा से शजर

किसी ने हम सेे कहा था बिछड़ते वक़्त सदा
रखोगे ख़ुद को यूँँ ही आप हक़-शनास शजर

ख़ुशी के फूल खिले थे हमारे होंठों पर
तुम्हारी याद अभी कर गई उदास शजर

नसीब वर हो तुम्हें 'इश्क़ रास आया है
ये 'इश्क़ आता नहीं है सभी को रास शजर

लबों के दर पे हँसी डर रही है आते हुए
ग़मों ने ख़ेमा लगाया है आस पास शजर

पलट के देस को परदेस से नहीं आए
हमारी टूट गई आज हाए आस शजर

ज़माने वाले तुम्हें ग़ौर-ओ-ख़ौज़ से सुनते
तुम्हारे लहजे में होती अगर मिठास शजर

  - Shajar Abbas

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