labon pe mere tabassum raha duhaai na thii | लबों पे मेरे तबस्सुम रहा दुहाई न थी

  - Shajar Abbas

लबों पे मेरे तबस्सुम रहा दुहाई न थी
कि मैंने हिज्र की ईज़ा कभी उठाई न थी

शब-ए-विसाल के मानिंद सोचता हूँ सदा
हसीं से क्यूँ ये हसीं तर शब-ए-जुदाई न थी

कमाल है ये तिरे हाथ का ख़ुदा की क़सम
वगरना पहले तो तस्वीर मुस्कुराई न थी

हमें यक़ीन है सीने में उसके दिल था मगर
मलाल ये है कि उस दिल में दिलरुबाई न थी

तिरे बग़ैर यूँँ महफ़िल सजा के रोने लगा
तिरे बग़ैर जो महफ़िल कभी सजाई न थी

मुआशरे में था इफ़लास अब से पहले मगर
ये बे-रिदाई ये मक्कारी बे-हयाई न थी

ये फ़न तो तुमसे बिछड़ने के बाद आया है
शजर में पहले कमाल-ए-ग़ज़ल सराई न थी

यज़ीद-ए-वक़्त के हामी हुए वही सब लोग
जहाँ में जिनकी शजर फ़िक्र कर्बलाई न थी

  - Shajar Abbas

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