रौनक़ न थी महफ़िल में यूँँ कोहराम नहीं था
मौजूद वहाँ आशिक़-ए-नाकाम नहीं था
क़िस्मत में लिखा था मिरी सहरा में भटकना
क़िस्मत में मिरी क़ैस सा आराम नहीं था
महताब न इतरा यूँँ चमक और धमक पर
महबूब मिरा आज सर-ए-बाम नहीं था
इक शख़्स के होंठों पे 'अजब फ़िक़रा था हाए
इस 'इश्क़ का आग़ाज़ था अंजाम नहीं था
मौजूद था माशूक़ मिरा बज़्म-ए-तरब में
हाथों में मगर उसके शजर जाम नहीं था
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