रोज़-ओ-शब लब पे ये ही नारा है
दिल हमारा नहीं तुम्हारा है
जान अपनी लुटा के चाहत में
हमने सदक़ा तेरा उतारा है
जब भी आया हूँ मैं मुसीबत में
दिल ने मेरे तुझे पुकारा है
इज़्ज़त-ए-नफ़्स मुफ़लिसों के लिए
ज़िन्दा रहने का इक सहारा है
ले के बाँहों में चूम लो इसको
बावली ये शजर तुम्हारा है
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