हिज्र को अपने फ़साना नहीं होने दूँगा
तुमको रुसवा-ए-ज़माना नहीं होने दूँगा
याद की तेग़ से नोचूँगा मैं हर रोज़ इन्हें
दिल के ज़ख़्मों को पुराना नहीं होने दूँगा
राहज़न बन के जिसे हुस्न हर इक दिन लूटे
अपने दिल को वो ख़ज़ाना नहीं होने दूँगा
उसकी ज़ुल्फ़ों को परेशानी का मज़हर कर के
मौसम-ए-शहर सुहाना नहीं होने दूँगा
अपना सर रख के लहू रोऊँगा इस पर मैं शजर
पल को वीराँ तिरा शाना नहीं होने दूँगा
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