छतों पे जब भटकता है क़मर आहिस्ता आहिस्ता
खुले जाते हैं सबके बाम ओ दर आहिस्ता आहिस्ता
उदासी की अमरबेलें मेरे सीने से हटती हैं
जभी खिलता है मुझ पे गुलमोहर आहिस्ता आहिस्ता
कभी तुम से मुलाक़ातों के लंबे सिलसिले होंगे
कभी देखेंगे तुम को आँखभर आहिस्ता आहिस्ता
— Shivam chaubey















