सब को पार उतर जाना है मेरा है घर पानी में
मेरे सपने मेरी नींदें मेरा बिस्तर पानी में
तुमको पाने की ख़्वाहिश इन आँखों में यूँँ डूबी है
डूब रहे हों जैसे सारे कंकड़ पत्थर पानी में
हाथ छुड़ाकर जाने वाले तुमको ये समझाए कौन
बिन चप्पू के खो जाती हैं नावें अक्सर पानी में
जाने क्या ही खोज रही है जाने क्या ही खोया है
कश्ती क्योंकर घूम रही है इतने चक्कर पानी में
यूँँ ही नहीं मैं जलपरियों की राहें तकता रहता हूँ
शायद इक दिन तुम भी आओ भेस बदलकर पानी में
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