उठा कर रख दिये हमने जतन से
उतारे हैं जो दुख अपने बदन से
नहीं मिलते हैं मेरे लोग वैसे
मिले सूरजमुखी जैसे किरन से
मुझे गमलों में रखकर क्या करोगे
मेरा क्या राब्ता है इस चमन से
मैं खुश तो हो नहीं पाया मगर सुन
तेरे कानों के झुमकों की खनन से
सफर की ओट लेकर के खड़े हैं
क़सम से थक गए हैं हम थकन से
किसी इम्कान पर आकर मिलेंगे
कभी लौटे जो हम इस राह ए रन से
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