उठा कर रख दिए हम ने जतन से
उतारे हैं जो दुख अपने बदन से
नहीं मिलते हैं मेरे लोग वैसे
मिले सूरज-मुखी जैसे किरन से
मुझे गमलों में रख कर क्या करोगे
मेरा क्या राब्ता है इस चमन से
मैं ख़ुश तो हो नहीं पाया मगर सुन
तेरे कानों के झुमकों की खनन से
सफ़र की ओट ले कर के खड़े हैं
क़सम से थक गए हैं हम थकन से
किसी इम्कान पर आ कर मिलेंगे
कभी लौटे जो हम इस राह ए रन से
— Shivam chaubey















