kaun-si baat kahaan kaise kahi jaati hai | कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है

  - Waseem Barelvi

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने
कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है

  - Waseem Barelvi

Baaten Shayari

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    बात ऐसी भी भला आप में क्या रक्खी है
    इक दिवाने ने ज़मीं सर पे उठा रक्खी है

    इत्तिफ़ाक़न कहीं मिल जाए तो कहना उससे
    तेरे शाइर ने बड़ी धूम मचा रक्खी है
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    Ismail Raaz
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    Shikha Pachouly
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    वो जब भी बात करती है तो बातें भीग जाती हैं
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    Aalok Shrivastav
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    जहान भर में न हो मयस्सर जो कोई शाना, हमें बताना
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    Vikram Gaur Vairagi
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    तन्हा होना, गुमसुम दिखना, कुछ ना कहना... ठीक नहीं
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    Dev Niranjan
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    Mirza Ghalib
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    हम हार गए तुम जीत गए हम ने खोया तुम ने पाया
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    Wali Aasi
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    इस बात से वफ़ा का कोई वास्ता नहीं
    Vikas Rajput
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As you were reading Shayari by Waseem Barelvi

    अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है
    किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है

    वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है
    मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है

    किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर
    मिरे अंदर कोई बच्चा बिलक कर रोने लगता है

    मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की
    यही सब देखता है और 'कबीरा' रोने लगता है

    समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्किय्यत
    पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है

    ये दिल बच कर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन
    जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है
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    Waseem Barelvi
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    नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया
    हमें किसी से निभाना भी तो नहीं आया

    जला के रख लिया हाथों के साथ दामन तक
    तुम्हें चराग़ बुझाना भी तो नहीं आया

    नए मकान बनाए तो फ़ासलों की तरह
    हमें ये शहर बसाना भी तो नहीं आया

    वो पूछता था मिरी आँख भीगने का सबब
    मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया

    'वसीम' देखना मुड़ मुड़ के वो उसी की तरफ़
    किसी को छोड़ के जाना भी तो नहीं आया
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    Waseem Barelvi
    हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती
    तो आज सर पे टपकने को छत नहीं होती

    हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल
    उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती

    चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का
    हवा के पास कोई मस्लहत नहीं होती

    हमें जो ख़ुद में सिमटने का फ़न नहीं आता
    तो आज ऐसी तिरी सल्तनत नहीं होती

    'वसीम' शहर में सच्चाइयों के लब होते
    तो आज ख़बरों में सब ख़ैरियत नहीं होती
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    Waseem Barelvi
    अपने अंदाज़ का अकेला था
    इस लिए मैं बड़ा अकेला था

    प्यार तो जन्म का अकेला था
    क्या मिरा तजरबा अकेला था

    साथ तेरा न कुछ बदल पाया
    मेरा ही रास्ता अकेला था

    बख़्शिश-ए-बे-हिसाब के आगे
    मेरा दस्त-ए-दुआ' अकेला था

    तेरी समझौते-बाज़ दुनिया में
    कौन मेरे सिवा अकेला था

    जो भी मिलता गले लगा लेता
    किस क़दर आइना अकेला था
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    Waseem Barelvi
    वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीक़े से
    मैं एतिबार न करता तो और क्या करता
    Waseem Barelvi
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