ख़ुश्क आँखों से दरिया बहाना हुआ
जब तेरा छोड़कर हम को जाना हुआ
अब बहारों का आना भी होता नहीं
जब भी आना हुआ ख़ूब आना हुआ
कुछ तो रुसवा मोहब्बत ने ही कर दिया
कुछ ज़माने का भी तंज़ ओ ताना हुआ
कस्र सोचा था पर कब्र बनती गई
क्या बनाना था और क्या बनाना हुआ
कुछ असर कर न पाई दुआएं तेरी
हर्फ़-ए-तोहमत तेरा जावेदाना हुआ
आ चुकी है शब-ए-मर्ग अब जो "सुमित"
ज़िंदगी को मेरी नींद आना हुआ
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