इक समुंदर की बहुत गहराई में उतरा हूँ मैं
इल्म मुझ को भी नहीं कितना अभी गहरा हूँ मैं
इन परिंदों से तो रिश्ता बन गया हैं ऐसा अब
यूँंँ लगा है लगने शायद इन का ही हिस्सा हूँ मैं
दिल नहीं करता किसी से बात भी करने का अब
कितनी सारी बातों को दिल से लगा बैठा हूँ मैं
जो सजी बुक-शेल्फ़ पर रहती अधूरी पढ़ के ही
उन किताबों का ही इक खोया हुआ क़िस्सा हूँ मैं
अक्स है पेश-ए-नजर तहरीर में मेरी तिरा
हर ग़ज़ल में नाम ओझल सा तिरा लिखता हूँ मैं
— Abhay Aadiv















