मत कहो अब ख़ाक हूँ मैं गर्द हूँ
नूर का क़तरा हूँ थोड़ा ज़र्द हूँ
ज़ुल्म तेरे सब समझता हूँ मगर
घर के ज़िम्मेदार सा इक फ़र्द हूँ
जाम-ए-इशरत कौन समझा है तुझे
देख लो मैं आज कूचा-गर्द हूँ
ख़ुश समुंदर आप आया लौट कर
जैसे मैं साहिल तेरा हमदर्द हूँ
कौन पहरा दे रहा आमिर मुझे
कोई पर्दे में हूँ या बेपर्द हूँ
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