बात तेरी नहीं समझ सकता
चाह कर भी नहीं समझ सकता
दूसरा चुन लिया हो जिसने यार
बदहवा सेी नहीं समझ सकता
मुँह में ढेला नमक का हो जिसके
बात मीठी नहीं समझ सकता
रहता हो जो तवायफ़ों के बीच
वो कहानी नहीं समझ सकता
आशिक़ी-वाशिक़ी की बातों को
इक शिकारी नहीं समझ सकता
As you were reading Shayari by Aatish Indori
our suggestion based on Aatish Indori
As you were reading undefined Shayari