ग़ैर के साथ कभी ज़िक्र हमारा न करें
हम को बद-नाम करें 'इश्क़ को रुस्वा न करें
दिल ये कहता है मुक़द्दर है परेशां रहना
अक़्ल कहती है कि हम ज़ुल्फ़ का सौदा न करें
क्या ज़रूरत है बला उन की संवारे गेसू
इक नज़र देख लें जिस को उसे दीवाना करें
क्या नहीं जानते हम रंग-ए-तलव्वुन उन का
मेहरबां पाएं भी तो अर्ज़-ए-तमन्ना न करें
'बेख़ुद'-ए-ज़ार को अब देख के झुक जाती हैं
वो निगाहें जो कभी पास किसी का न करें
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