khala ke jaisa koi darmiyaan bhi padta | ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता

  - Abhishek shukla

ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता
फिर इस सफ़र में कहीं आसमान भी पड़ता

मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर
मज़ा तो जब था कि कोई निशान भी पड़ता

अजीब ख़्वाहिशें उठती हैं इस ख़राबे में
गुज़र रहे हैं तो अपना मकान भी पड़ता

हमीं जहान के पीछे पड़े रहें कब तक
हमारे पीछे कभी ये जहान भी पड़ता

ये इक कमी कि जो अब ज़िंदगी सी लगती है
हमारी धूप में वो साएबान भी पड़ता

हर एक रोज़ इसी ज़िंदगी की तय्यारी
सो चाहते हैं कभी इम्तिहान भी पड़ता

  - Abhishek shukla

Safar Shayari

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