अब नहीं हम उदास बैठे हैं
अपने हमदम के पास बैठे हैं
ये हवा भी गुज़र नहीं सकती
इतने हम पास पास बैठे हैं
चूम लूँ मैं तुम्हारे गालों को
लोग पर आस पास बैठे हैं
उस के हाथों नहीं लगे मरहम
ज़ख़्म सारे उदास बैठे हैं
जाम लाओ हमारी टेबल पर
ले के कब से गिलास बैठे हैं
बात सुन लो ज़रा हमारी भी
जानता हूँ कि ख़ास बैठे हैं
अब तो महफूज़ भी नहीं औरत
मर्द ले कर लिबास बैठे हैं
— Afzal Sultanpuri















