दस्त-ए-दिलदार क्यूँ नहीं मिलता
मिल के भी यार क्यूँ नहीं मिलता
कितना भी वो क़रीब आ जाए
लब से रुख़्सार क्यूँ नहीं मिलता
शाहज़ादी इधर तो आती हैं
उनका दीदार क्यूँ नहीं मिलता
है यही चाह चोट खाऊँ मैं
राह में ख़ार क्यूँ नहीं मिलता
एक उम्मीद सौ परेशानी
प्यार में प्यार क्यूँ नहीं मिलता
उनकी हसरत गले लगाने की
वो तलबगार क्यूँ नहीं मिलता
देखता है मुझे किनारे से
वो नदी पार क्यूँ नहीं मिलता
दिल जहाँ कौड़ियों के भाव मिले
वैसा बाज़ार क्यूँ नहीं मिलता
बेचना है मुझे सुख़न अपना
ये ख़रीदार क्यूँ नहीं मिलता
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