बिछड़ कर तुझ सेे अच्छा लग रहा है

मगर ये ख़ुद से धोखा लग रहा है

ये शायद आठवां है इश्क़ मेरा
मुझे पर पहला-पहला लग रहा है

जुदा हम दो बरस पहले हुए थे
मगर ये कल का क़िस्सा लग रहा है

जो तेरे वास्ते जादूगरी है
मुझे आँखों का धोखा लग रहा है

हक़ीक़त जानता हूँ पहले से ही
सो तेरा झूठ अच्छा लग रहा है

तेरे आने पे इतने ख़ुश नहीं थे
तेरे जाने का सदमा लग रहा है

उसे आदत सी मेरी लग रही है
मुझे कुछ प्यार जैसा लग रहा है

— Ankit Maurya

More by Ankit Maurya

Other ghazal from the same pen

See all from Ankit Maurya →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling