ज़मीन अपनी है और ईंट गारा उस का है

मकान-ए-इश्क़ में हिस्सा हमारा उस का है

मैं ये जो साथ लिए फिरता हूँ ख़ज़ाना-ए-इश्क़
अगर वो हाथ उठा दे तो सारा उस का है

शुरुअ दिन से ही मैं जंग का मुख़ालिफ़ था
मगर मैं क्या करूँ अब के इशारा उस का है

वो दोस्त जिस से कि अब बात भी नहीं होती
अगर मैं गिर पड़ूँ पहला सहारा उस का है

— Ashu Mishra

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