ज़मीन अपनी है और ईंट गारा उसका है
मकान-ए-इश्क़ में हिस्सा हमारा उसका है
मैं ये जो साथ लिए फिरता हूँ ख़ज़ाना-ए-इश्क़
अगर वो हाथ उठा दे तो सारा उसका है
शुरुअ दिन से ही मैं जंग का मुख़ालिफ़ था
मगर मैं क्या करूँँ अबके इशारा उसका है
वो दोस्त जिस सेे कि अब बात भी नहीं होती
अगर मैं गिर पड़ूँ पहला सहारा उसका है
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