वक़्त को ख़ुशनुमा बनाते हैं
आइए क़हक़हा बनाते हैं
उस ने सब कुछ बना के भेजा है
हम यहाँ क्या नया बनाते हैं
चल ख़लाओं में घूमते हैं कहीं
चाँद पर नक़्श-ए-पा बनाते हैं
देखना है नए ये कूज़ा-गर
मेरी मिट्टी का क्या बनाते हैं
मैं चराग़ों में लौ बनाता हूँ
दुनिया वाले हवा बनाते हैं
— Ashu Mishra















